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भारत के महान गणितज्ञ आर्यभट्ट का जीवन परिचय | Aryabhatt biography and inventions in hindi

आर्यभट की जीवनी, जीवन परिचय, जन्म कब हुआ, कौन थे, जयंती, उपग्रह, खोज (Aryabhatt biography and inventions in hindi, Aryabhatt History hindi) (Date of Birth, Jayanti, Foundation, Books, Inventions)

भारत का प्राचीन एवं पौराणिक इतिहास दोनों ही विज्ञान तथा तकनीकी से संपन्न है। प्राचीन काल में ही भारत में ऐसी भव्य वैज्ञानिक खोजें तथा तकनीकी विकसित हुई थी जिनका पता पूरी दुनिया को नहीं था।

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लेकिन फिर भी आज जब विज्ञान और तकनीकी की बात होती है तो उन विदेशी वैज्ञानिकों को खोज अनुसंधान का श्रेय दिया जाता है जिनके जन्म के कई वर्षों पूर्व ही भारतीय वैज्ञानिक महर्षियों ने ऐसे सिद्धांतों की नींव रख दी थी।

भारत के इन्हीं प्राचीन वैज्ञानिकों में गणित के जनक कहे जाने वाले आर्यभट्ट जी का नाम भी शामिल है। भारत के महान गणितज्ञ खगोलविद एवं ज्योतिषविद् आर्यभट्ट को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान विद्वानों में से एक है।

पृथ्वी गोल है एवं अपनी धुरी पर घूमती है जिस कारण दिन और रात होते हैं , मध्यकाल में निकोलस कॉपरनिकस ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था लेकिन वास्तविकता यह है कि हजारों साल पहले आर्यभट्ट ने इसकी खोज कर ली थी।

आर्यभट्ट पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने बीजगणित का प्रयोग किया था।

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आर्यभट्ट से जुड़ी कई ऐसी महत्वपूर्ण बातें हैं जो हम सभी को जानने की आवश्यकता है । इसीलिए आज किस आर्टिकल में हम महान गणितज्ञ आर्यभट्ट से जुड़े हुए सभी महत्वपूर्ण बातें आर्यभट्ट की जीवनी, गणित एवं सौरमंडल के क्षेत्र में उनका योगदान के विषय में विस्तार से जानकारी देंगे।

आर्यभट्ट का जीवन परिचय | history-aryabhatta-biography-in-hindi-Inventions

विषय–सूची

आर्यभट्ट का जीवन परिचय (Aryabhatt biography and inventions in hindi)

नामआर्यभट्ट
जन्म476 ईस्वी
जन्म स्थानअस्मक (महाराष्ट्र)
रचनाएंअर्यभट्टीय, आर्यभट्ट सिद्धांत
कार्यक्षेत्रगणितज्ञ, खगोल शास्त्री, ज्योतिषविद्
योगदानशून्य की खोज, पाई की खोज
कालगुप्त काल
मृत्यु550 ईस्वी

आर्यभट्ट का नाम प्राचीन भारत के महान विद्वानों वराह मिहिर भास्कर आचार्य एवं ब्रह्म गुप्त आदि में शामिल था। 1975 में भारत ने  पहला उपग्रह लॉन्च किया, जिसका  नाम ‘आर्यभट्ट’ भी  महान  गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ही रखा था।

आर्यभट्ट का गणित के  साथ साथ सौरमंडल के क्षेत्र में भी अहम योगदान रहा है। आर्यभट्ट के बाद 875 ईस्वी में आर्यभट्ट द्वितीय हुए, इन्होंने ज्योतिष पर महासिद्धांत नामक ग्रंथ लिखा।

आर्यभट्ट द्वितीय ज्योतिष और गणित दोनों के ज्ञाता थे। आर्यभट्ट द्वितीय को ‘लघु आर्यभट्ट’ में कहा जाता था।

आर्यभट्ट का प्रारंभिक जीवन (Earlier life of Aryabhatt)

आर्यभट्ट के जन्म के संबंध में कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि उनका जन्म 476 ईसवी में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट गुप्त साम्राज्य के राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में थे जिन्हें विक्रमादित्य की उपाधि मिली थी।

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आर्यभटीय में उनका जन्म स्थान कुसुमपुर एवं जन्म शक संवत 398(476 ईस्वी) लिखा गया है। कहा जाता है कि

आर्यभट्ट के जन्म स्थान  को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म  महाराष्ट्र के अस्मक प्रदेश में हुआ था।

ऐसा भी माना जाता है कि आर्यभट्ट का जन्म पटना (पाटलिपुत्र) में  कुसुमपुर में हुआ था।

आर्यभट्ट की शिक्षा (Education of Arybhatt)

माना जाता है कि आर्यभट्ट ने अपनी शिक्षा पाटलिपुत्र में रहकर ही पूरी की। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि  बाद में आर्यभट्ट पाटलिपुत्र में एक  शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष के पद पर भी रहे।। यह भी माना जाता है कि आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के भी अध्यक्ष रहे।

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आर्यभट्ट ने मात्र 23 साल की आयु में आर्यभटिया नामक ग्रंथ लिखा था इस ग्रंथ को राजा बुद्ध गुप्त ने स्वीकृति देते हुए उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बनाया  दिया था।

आर्यभट्ट के शिष्यों में एक नाम प्रसिद्ध खगोल शास्त्री वराहमिहिर का भी आता है।

आर्यभट्ट के सिद्धांत

आर्यभट्ट ने कई सिद्धांत दिए जिनमें ‘बॉलिस सिद्धांत’ ‘रोमाक सिद्धांत’ एवं ‘सूर्य सिद्धांत’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। आर्यभट्ट के प्रयासों के फलस्वरूप ही खगोल विज्ञान को गणित से अलग किया गया।

आर्य सिद्धांत:

आर्य सिद्धांत खगोलीय  घटनाओं पर आधारित है। यह ग्रंथ अब लुप्त हो चुका है। इनकी रचनाओं के अवशेषों में अनेक खगोलीय उपकरणों के विषय में जानकारी मिलती है जिसमें की शंकु यंत्र (Gnomon),छाया यंत्र (shadow Instrument), बेलनाकार यस्ती यंत्र (Cylindrical Stick),छत्र यंत्र (Umbrella Shaped Device),जल घड़ी ( Water clock) और  कोण मापी उपकरण ( Angle measuring device) और धनुर  यंत्र (semi circular instrument) आदि शामिल हैं।

आर्यभट्ट ने इस रचना में सूर्य सिद्धांत का भी प्रयोग किया।

आर्यभट्ट के कार्य एवं योगदान

आश्चर्य की बात है कि आज से 1600 साल पहले जिस समय नाही कोई वैज्ञानिक उपकरण था और ना ही कोई  गणना का साधन था,

आर्यभट्ट ने बिना गणित के उपयोग किए ही गणित के सूत्र एवं खगोलीय पिंडों की गतिशीलता की जानकारी दे डाली थी।

और यह सारी गणनाए उन्होंने एल्फाबेट के माध्यम से की, जिसमें गणितीय सूत्रों का कहीं भी  इस्तेमाल नहीं किया गया था।

आर्यभट्ट के कार्यों की जानकारी उनके द्वारा रचित उनके ग्रंथों से  प्राप्त होती है। आर्यभट्ट जब 23 साल के थे तो कलयुग के 36 100 साल निकल चुके थे इस बात से यह पता चलता है कि वह समय 449 ईसवी था।

आर्यभट्ट ने मुख्य तौर पर गणित एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में कार्य किए।

आर्यभट्ट के प्रसिद्ध ग्रंथ आर्यभटिया में उनकी कई खोजों के विषय में जानकारी मिलती है।

आर्यभट्ट की प्रमुख रचनाएं

  • आर्यभटीय
  • दशगीतिका
  • तंत्र
  • आर्यभट्ट सिद्धांत

आर्यभट्ट का ग्रंथ (आर्यभटीय)

आर्यभट्ट जब केवल 23 साल के थे, तब उन्होंने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना की थी । जिसमें उनकी अनेक खोजों की पूरी जानकारी है।हालांकि माना जाता है कि इस ग्रंथ का नाम आर्यभट्ट ने नहीं रखा था बल्कि यह अन्य विद्वानों या उनके शिष्यों द्वारा रखा गया था।

आर्यभट्ट किस ग्रंथ को आर्य शत अष्ट नाम से भी जाना जाता है। अर्थात (आर्यभट्ट के 108 – छंदों की संख्या) आर्यभट्ट ने अपने इस ग्रंथ के विषय में कहीं भी वर्णन नहीं किया था। आर्यभटिया में वर्गमूल घनमूल समांतर श्रेणी विभिन्न समीकरणों का वर्णन है । इस ग्रंथ में पतंजलि घात समीकरण घाट श्रृंखला के योग ज्या (sin)एवं कोज्या (cos) के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है।

आर्यभट्ट का यह ग्रंथ 4 पदों या अध्यायों में विभाजित है जिसमें 108 छंद है ।

आर्यभटीय में स्थित 4 पद :

  • गीतिकापद (13 छंद)
  • गणितपद (33 छंद)
  • कालक्रियापद (25 छंद)
  • गोलपद (50 छंद)

गीतिकापद: गीतिका पद में 13 छंद है। गीतिका पद में समय की बड़ी-बड़ी इकाइयों का वर्णन मिलता है जिसमें त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलयुग की पूर्ण रूप से जानकारी दी गई है।

दीपिका पद में आर्यभट्ट ने ब्लैक होल (black hole) का भी वर्णन किया है।

गणित पद: गणित पद में कुल 33 छंद है। जिसमें कि आर्यभट्ट ने गणित की पूरी जानकारी विस्तार पूर्वक दी है। इसमें आर्यभट्ट ने simple equation, quadratic equation, simultaneous equation aur intermediate equation का भी विस्तार से वर्णन किया है।

इसमें अंकगणित एवं बीजगणित को भी समझाया गया है। वर्गमूल घनमूल समांतर श्रेणी एवं अन्य समीकरणों के विषय में भी बताया गया है।

कॉल क्रियापद: कॉल क्रियापद में 25 छंद है । इसमें समय की विभिन्न इकाइयों के विषय में बताया गया है तथा ग्रहों की स्थिति पृथ्वी कर रिवोल्यूशन और रोटेशन के विषय में गणना की गई है।

इसी आधार पर पंचांग भी बनाए गए हैं जिनमें शुभ और अशुभ मुहूर्त की गणना की गई है।

गोला पद: गोला पद में 50 छंद है इसमें त्रिकोणमिति और ज्यामिति के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है तथा साथ ही पृथ्वी के आकार दिन-रात होने का कारण आकाशीय भूमध्य रेखा के विषय में बताया गया है।

आर्यभट्ट का गणितज्ञ के रूप में योगदान

पाई की खोज:

सबसे पहले आर्यभट्ट ने हीं पाई कि मान की खोज की थी। इसका वर्णन आर्यभटीय के गणितपाद 10 में मिलता है। आर्यभट्ट ने पाई का आर्कमिडीज से भी अधिक सटीक मान  निरूपित किया था। आर्यभट्ट ने गणितपद में बताया कि , 100 में 4 जोड़कर, फिर 8 से गुणा करें, फिर 62,000 जोड़ें और 20,000 से भागफल  निकाले । इससे प्राप्त मान पाई का मान होगा।

[(4+100)*8+62000]/20000=,62, 832/20,000= 3.1416

कुछ विद्वानों का मानना है कि आर्यभट्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था लेकिन उनके किसी उनके ग्रंथ में इसका कहीं भी साक्ष्य नहीं मिलता। इसीलिए इसका श्रेय आर्यभट्ट को नहीं मिला।

1761 में लैंबर्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया और इसका श्रेय लैंबर्ट को ही दिया गया।

शून्य की खोज:

आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम गणित की सर्वश्रेष्ठ खोज की जो ज्योति उनके द्वारा की गई शून्य की खोज। आर्यभट्ट ने संख्याओं को आगे बढ़ाने के लिए एवं घटनाओं को पूर्ण करने के लिए दशमलव का उपयोग किया और इस दशमलव को उन्होंने शून्य नाम दिया।

बीजगणित व समीकरण

  • आर्यभट्ट ने ही सबसे पहले बीजगणित में संख्याओं के वर्ग एवं घन श्रेणी के लिए सूत्र का प्रतिपादन किया।
  • आर्यभट्ट द्वारा कुटुक सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया जिससे चर समीकरणों का हल निकाला जाता है।
  • उन्होंने कुटुक सिद्धांतों से ax+by=c, जैसी समीकरण का हल प्राप्त किया।
  • आर्यभट्ट नहीं सबसे पहले वर्गो एवं घरों की श्रृंखला को जोड़ने का सूत्र निकाला।
  • 1^2+2^2+………..+n^2=n (n+1) (2n+1)/6

त्रिकोणमिति

  • आर्यभट्ट द्वारा रचित गणितपद 6 में त्रिभुज के क्षेत्रफल का के विषय में बताया गया है।
  • आर्यभट्ट ने ही त्रिकोणमिति में सर्वप्रथम ज्या (sine) एवं कोज्या (cosine) फलनों की रचना की।
  • जब उनके ग्रंथ को अरब भाषा में अनुवादित किया गया तो इन्हीं शब्दों को जैया (jaiya) तथा कौज्या (kojaiya)  कहा गया।
  • फिर इन्हीं अरब किताबों को जब लैटिन भाषा में अनुवादित किया गया तो इन्हें साइन एवं  कोसाइन नाम दिया गया।

आर्यभट्ट का खगोल शास्त्री के रूप में योगदान (Aryabhatt as an Astronomer)

ग्रहों के गति के विषय में जानकारी

  • सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही परिकल्पना की  यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी गोल है एवं अपनी धुरी पर घूमती है।
  • आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी के लोगों को तारे चलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन सारे स्थित है तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। जिसकी वजह से हमें तारे पश्चिम दिशा की ओर जाते हुए दिखते हैं।
  • आर्यभट्ट ने सभी ग्रहों को पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित क्रम में लगाया,  जिसका क्रम है- चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि व तारे

आर्यभट्ट ने सूर्य से अन्य ग्रहों की दूरी की माप भी बताई, जो इस प्रकार है-

  • बुद्ध: . 375 AU
  • शुक्र: . 725 AU
  • मंगल: . 1.538 AU
  • गुरु: 4.16 AU
  • शनि: 9.41 AU

दिन-रात का होना

  • आर्यभट्ट ने यह बताया था कि पृथ्वी की परिधि लगभग 24,835 मील है और इसकी अपनी दूरी में घूमने के कारण ही दिन और रात होते हैं।
  • आर्यभट्ट ने ही बताया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिसमें उसे 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड का समय लगता है। और वर्तमान में वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार यह समय है 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकंड। अर्थात आर्यभट्ट की गणना में मात्र .01  का ही अंतर था।
  • आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी को तारों  की परिक्रमा करने में 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट तथा 30 सेकंड लगते हैं। वर्तमान में वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार आर्यभट्ट द्वारा बताए गया समय  केवल 3 मिनट ज्यादा है।

ग्रहण (Eclipse)के विषय में जानकारी दी

आर्यभट्ट ने इस बात की पुष्टि की कि पृथ्वी की तरह अन्य ग्रह भी अपनी धुरी पर घूमते हैं और इसी का कारण है चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण। हिंदू मान्यता के अनुसार राहु ग्रह द्वारा सूर्य और चंद्रमा को निकल जाने पर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण होता है आर्यभट्ट ने इस सिद्धांत को गलत साबित किया ।

आर्यभट्ट ने वैज्ञानिक ढंग से ग्रहण की व्याख्या की।

  • पृथ्वी की तरह है अन्य ग्रह भी अपनी दूरी पर घूमते हैं जिसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होता है।
  • आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता वास्तव में वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशमान होता है।

चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse)

चंद्रमा जब अपने अक्ष पर घूमता है तो वह पृथ्वी की परिक्रमा के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करता है । और इसी दौरान सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं ।

सूर्य और चंद्रमा के बीच में जब पृथ्वी आती है, तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और वह सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुँच पाता, इस घटना को चंद्रग्रहण कहते हैं ।

सूर्य ग्रहण

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और अपने उस पर घूमते हुए वह सूर्य की परिक्रमा करती है।

इसी प्रकार चंद्रमा भी अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की और सूर्य की परिक्रमा करता है और इसी दौरान जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य में चंद्रमा आ जाता है। चंद्रमा के बीच में आने से हमें सूर्य का कुछ हिस्सा दिखाई नहीं देता रोहित काला दिखाई पड़ता है और इसी घटना को सूर्यग्रहण कहते हैं।

आर्यभट्ट की मृत्यु

आर्यभट्ट की मृत्यु 550 ईसवी में हुई थी । माना जाता है कि उनके मृत्यु का स्थान पाटलिपुत्र ही था।

लेकिन बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि आज हमारे शिक्षा प्रणाली में आर्यभट्ट एवं उनके जैसे महान विद्वान वराहमिहर भास्करचार्य रामानुज आदि के विषय में कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता।

आर्यभट्ट द्वारा की गई अन्य खोज :

  • आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि की लंबाई 3996 8.0 5 किलोमीटर बताई। वास्तव में यह लंबाई 400 75 पॉइंट ज़ीरो 1 किलोमीटर है जोकि आर्यभट्ट की बताई गई लंबाई से केवल .2% कम है।
  • आर्यभट्ट ने वायु मंडल की ऊंचाई 80 किलोमीटर बताई थी वास्तव में वायुमंडल की ऊंचाई 16 किलोमीटर से भी ज्यादा है लेकिन वायुमंडल का 99% हिस्सा केवल 80 किलोमीटर तक ही सीमित है।
  • आर्यभट्ट ने सूर्य से अन्य ग्रहों की बीच की दूरी के विषय में बताया था जैसे कि Astronomical Unit (AU) कहा जाता है।

सम्मान (Work for the Prestige of Aryabhatt)

गणित  एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट के अभूतपूर्व योगदान को हमेशा स्मरण किया जाएगा। आर्यभट्ट प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं एक महान खगोल शास्त्री थे।

आर्यभट्ट को सम्मानित करने के लिए निम्न कार्य किए गए हैं।

भारत का पहला सेटेलाइट ‘आर्यभट्ट’ के नाम पर ही रखा गया।

भारत सरकार द्वारा आर्यभट्ट की प्रतिष्ठा में 1975 में लांच किया गया पहले सेटेलाइट का नाम ‘आर्यभट्ट’ रखा गया।

चांद की पूर्वी दिशा की ओर जो गड्ढे हैं उनको आर्यभट्ट नाम दिया गया है। आर्यभट्ट की प्रतिष्ठा में बिहार सरकार ने आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी की स्थापना की जो पटना से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

भारत सरकार द्वारा 2 रुपए के नोट के पीछे आर्यभट्ट सेटेलाइट की फोटो लगाई गई है।

FAQ

आर्यभट्ट का जन्म कब हुआ था??

उनका जन्म 476ई-वी- में पटना के पाटलिपुत्र में हुआ था।

आर्यभट्ट ने किसकी खोज की थी

आर्यभट्ट एक महान गणितज्ञ और अविष्कारक थे उन्होंने शून्य, पाई के मान की खोज, पृथ्वी की गति, त्रिकोणमिति, बीज गणित के समीकरण, वर्ग व घन श्रेणी के सूत्र का प्रतिपादन, ग्रहों की स्थिति, ग्रहण के बारे में पूरी जानकारी जैसे अनेकों अविष्कार किये थे।

आर्यभट्ट की प्रमुख रचनाएं कौन सी थी?

आर्यभटीय, दशगीतिका, तंत्र, आर्यभट्ट सिद्धांत प्रमुख रचनाएं हैं।

आर्यभट्ट की मृत्यु कब हुई?

550 ईसवी में पाटलिपुत्र

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