स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय, जयंती 2022 व अनमोल वचन | Swami Vivekananda biography in hindi

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद जयंती 2022, राष्ट्रीय युवा दिवस कब है? Jayanti 2022, quotes Swami Vivekananda biography in hindi

पूरे भारत में 12 जनवरी व मकर संक्राति के दिन राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। अपने नाम के अनुरूप ही यह दिवस बहुत ही विशेष है साथ ही साथ इसी दिन भारत के महान दार्शनिक और सम्पूर्ण विश्व को हिंदू आध्यात्म दर्शन से परिचित कराने वाले स्वामी श्री विवेकानंद जी का जन्म भी हुआ था।

स्वामी विवेकानन्द जी ने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा सम्मेलन में भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया था और इसके आध्यात्मिक दर्शन और इसकी महानताओ से पूरे विश्व को परिचित कराया था।

इस घटना को ऐतिहासिक ख्याति प्राप्त है जिसके लिए सनातन संस्कृति के इतिहास में स्वामी विवेकानंद जी को सदैव संस्मरण किया जाएगा।

तो आइए इस आर्टिकल के माध्यम से भारत के महान दार्शनिक, साहित्यकार, समाजसुधारक और विचारक स्वामी विवेकानंद जी के जीवन परिचय पर भी प्रकाश डालते हैं।

किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए देश के युवाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी भी देश का भविष्य उसके युवा पीढ़ी के ऊपर निर्भर होता है देश की नई पीढ़ी जिस हिसाब से विकसित होते हैं ठीक उसी तरीके से ही उस देश का भी विकास होता है।

इसीलिए देश की नई युवा पीढ़ी को नई चेतना और उमंग देने के लिए प्रत्येक वर्ष भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है साथ ही साथ इस दिन देशभर में युवाओं को संगठित करके उन्हें प्रेरित और उनमें नेतृत्व की क्षमता को विकसित करने के लिए विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?

दरअसल स्वामी विवेकानंद जी का युवाओं के साथ काफी जुड़ाव था। स्वामी विवेकानंद जी ने नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी और विवेकानंद जी अपनी युवावस्था में सफलता प्राप्त करने वाले और संपूर्ण विश्व को अपनी प्रतिभा से प्रभावित करने वाले लोगों के लिए सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

इसलिए भारत सरकार ने सन 1985 में 12 जनवरी को प्रति वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने की घोषणा की थी ताकि भारतीय नई युवा पीढ़ी उनके आदर्शों से प्रेरित हो सके और उनकी जीवन शैली को अपनाकर राष्ट्र के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दें। तभी से पूरे भारतवर्ष में 12 जनवरी का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाया जाता है।

आइये जाने राष्ट्रीय युवा दिवस का उद्देश्य, इतिहास व निबंध (National Youth Day 2022)

swami-vivekananda-biography-in-hindi

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekananda Biography in hindi)

अपनी युवावस्था में ही संन्यास लेकर संपूर्ण विश्व को भारतीय सनातन संस्कृति से अवगत कराने वाले महान युग पुरुष स्वामी विवेकानंद जी एक महान दार्शनिक विचारक थे।

दर्शनशास्त्र के साथ-साथ स्वामी जी को साहित्य और इतिहास का भी बहुत अच्छा ज्ञान था। स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन में योग राजयोग और ज्ञान योग जैसे ग्रंथों की रचना की है और नई युवा पीढ़ी को एक नई दिशा दी है।

स्वामी विवेकानंद जी ने संपूर्ण विश्व को आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन से प्रेरित करते हुए भारतीय संस्कृति को संपूर्ण विश्व में गौरवान्वित किया।

स्वामी विवेकानंद के बारे में जानकारी (Swami Vivekananda, Age, Education, father name)

प्रसिद्ध नाम (Full Name)स्वामी विवेकानंद
मूल नाम (Real Name)नरेन, नरेन्द्र दास दत्त
जन्म (Date of Birth)12 जनवरी 1863
पिता (Father Name)विश्वनाथ दत्त
माता का नाम (Mother Name)भुवनेश्वरी देवी
जन्म स्थान (Place of Birth)कलकत्ता
शिक्षाबीए (बेचलर ऑफ़ आर्ट 1984)
गुरु का नामरामकृष्ण परमहंस
स्थापना (Founder)रामकृष्ण मिशन की स्थापना, 1 मई 1897
पेशा (Profession)अध्यात्मिक गुरु, लेखक, कवि, समाज सुधारक
नागरिकता (Nationality)भारतीय
मृत्यु के समय उम्र (Age)39 वर्ष
मृत्यु का कारणअस्थमा व मधुमेह
निधन (Death)4 जुलाई 1902 (बेलूर, पश्चिम बंगाल)
विवाह (Marital Status)विवाह नहीं किया

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म (Swami Vivekananda Birth)

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी सन 1863 को कोलकाता में हुआ था। बचपन में इन्हें इनके घर में नरेंद्र दत्त के नाम से बुलाया जाता था।

इनके पिता पेशे से एक वकील थे जिनका नाम विश्वनाथ दत्त था जो कोलकाता हाई कोर्ट में वकालत करते थे और काफी चर्चित भी थे

इनके पिता भारतीय पाश्चात्य सभ्यता में निष्ठा रखते थे और वह अपने बेटे को भी इसी पाश्चात्य परंपरा के अनुसार ही चलाना चाहते थे। स्वामी जी के माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

इनकी माता अत्यंत धार्मिक विचारों वाली स्त्री थी जिन्हें रामायण महाभारत आदि जैसे महान सनातन ग्रंथों की अच्छी शिक्षा थी। ऐसे परिवेश में रहने पर स्वामी जी पर भी इन सब चीजों का काफी प्रभाव पड़ा और बचपन से ही वह सनातन संस्कृति में रुचि लेने लगे।

अपने माता-पिता के विचारों का उन पर इतना प्रबल प्रभाव पड़ा कि बचपन से ही उन्होंने ध्यान आदि की जीवनशैली अपना ली। अपने जीवन में इस आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए उन्हें प्रारंभिक प्रेरणा उनके घर और माता-पिता से ही मिली थी।

बचपन से ही स्वामी विवेकानंद जी कुशाग्र बुद्धि के थे उनकी स्मरण शक्ति इतनी अधिक थी कि यह एक बार जिसे भी देख या पढ़ लेते उसे हमेशा याद रखते फिर से उन्हें दोबारा उन चीजों को याद करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

बचपन से ही सन्यास और सन्यासियों में काफी रुचि रखने के बाद उन्होंने युवावस्था में ही सन्यास अपना लिया था वह सन्यासियों के माध्यम से जीवन के दार्शनिकता को समझने में विश्वास रखते थे।

अपनी इसी गुणवत्ता को हथियार अपने जीवन शैली में अपनाकर नरेंद्र दत्त संपूर्ण विश्व को सनातन संस्कृति के प्रकाश से प्रकाशित करने वाले स्वामी विवेकानंद जी के नाम से प्रख्यात हुए।

स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षा-दीक्षा (Education)

स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षा का आरंभ 1871 से हुआ जब उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलियन शिक्षण संस्थान में प्रवेश लिया।

लेकिन आगे चलकर सन 1877 में उनके परिवार को किसी कारण वश रायपुर जाना पड़ा जिससे उनकी पढ़ाई का क्रम बीच में ही टूट गया।

सन 1879 ईस्वी में स्वामी विवेकानंद अपने पूरे परिवार के साथ लौटकर वापस कोलकाता आ गए और इन्होंने यहां आकर प्रेसिडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की जिसमें इन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।

स्वामी विवेकानंद जी अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान इतिहास कला और साहित्य को पढ़ने में बहुत रुचि रखते थे लेकिन साथ ही साथ उन्हें धार्मिक विषयों में बहुत ज्यादा रुचि थी अपनी माता से प्रभावित होकर उन्हें वेद महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों से शिक्षा लेने में बहुत आनंद आता था।

सन 1881 ईस्वी में स्वामी विवेकानंद जी ने ललित कला की परीक्षा पास की और बैचलर ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया और सन 1884 ईस्वी में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने वकालत की पढ़ाई शुरू कर दी।

कोलकाता का निवासी होने के कारण स्वामी विवेकानंद जी को बंगाली का भी अच्छा खासा ज्ञान था इन्होंने ‘स्पेंसर’ के द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘एजुकेशन’ का बंगाली भाषा में अनुवाद किया था।

अपनी शिक्षा के इसी क्रम में उन्होंने अध्यात्म से परिचित होने के लिए महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के सानिध्य में ब्रह्म समाज मे हिस्सा लिया।

सन 1884 में उनके पिता की मृत्यु के के बाद इन्हें आर्थिक मंदी से गुजरना पड़ा जिस समय पूरे परिवार का दायित्व इन्हीं के सर आ गया था।

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी जी का संबंध

स्वामी विवेकानंद जी अत्यंत जिज्ञासु प्रकृति के थे जब इन्होंने महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर के सानिध्य में ब्रह्म समाज को ग्रहण किया उस समय उन्होंने देवेंद्र नाथ ठाकुर से पूछा था कि क्या उन्होंने कभी इश्वर को देखा है। महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर निरुत्तर हो गए और उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी को सुझाव दिया कि उन्हें एक बार रामकृष्ण परमहंस जी से मिलना चाहिए जहां वे अपने सभी आध्यात्मिक तर्क कर सकें और उन्हें उनके उत्तर भी मिल सके।

स्वामी जी ने महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर के मुंह से रामकृष्ण परमहंस जी की काफी प्रशंसा सुनी थी जिसके कारण एक बार उनके मन में रामकृष्ण परमहंस जी से मिलने का विचार आया और वह उनसे तर्क करने चले गए।

जब यह पहली बार रामकृष्ण परमहंस जी से मिले तो उनकी महिमा से अत्यंत प्रभावित हुए और तभी से उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया धीरे-धीरे उनके मन में राम कृष्ण परमहंस जी के लिए सम्मान बढ़ता गया।

सन 1885 में रामकृष्ण परमहंस जी कैंसर रोग से पीड़ित थे उनके बिगड़े हुए स्वास्थ्य के समय स्वामी विवेकानंद जी ने उनकी बहुत सेवा की जिसके कारण उनके और रामकृष्ण परमहंस जी के बीच काफी गहरा संबंध हो गया था।

कैंसर रोग से पीड़ित होने के कारण कुछ ही समय बाद उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी की मृत्यु हो गई जिसके बाद उन्होंने गुरुजी की याद में वराह नगर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की और यहीं पर उन्होंने अपने गृहस्थ आश्रम को त्याग कर ब्रम्हचर्य का संकल्प लिया।

ऐतिहासिक विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो में स्वामी विवेकानंद जी का भाषण –

सन 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन किया गया था इसी समय स्वामी जी भी अमेरिका में गया और उन्होंने शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।

इसी विश्व धर्म सम्मेलन में आए हुए विभिन्न धर्म के धर्म गुरुओं ने अपनी अपनी पुस्तकें सम्मेलन के समक्ष रखी लेकिन विवेकानंद जी ने भागवत गीता रखी जिसके कारण लोगों ने उनका बहुत उपहास किया।

उस समय यूरोप अमेरिका एवं अन्य विदेशी देशों में भारत की छवि ऐसी थी कि वहां के लोग भारतीयों को बहुत हीन भावना से देखते थे जिसके कारण उन्होंने बहुत प्रयास किया कि इस विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद जी को बोलने ही नहीं न दिया जाए।

लेकिन जब स्वामी विवेकानंद जी को बहुत थोड़ा सा समय संबोधित करने के लिए मिला तो उनका भाषण सुनकर पूरे सभागार में बैठे हुए श्रोता आश्चर्यचकित हो गए।

जब उन्होंने शिकागो के सम्मेलन में अमेरिका के भाइयों बहनों करते हुए शुरुआत की तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। एक धर्मगुरु की ऐसी शालीन प्रकृति देखकर सभागार में बैठे सभी श्रोता उनसे से बहुत प्रभावित हुए।

उन्होंने अपने भाषण में कई संस्कृत के श्लोकों का भी उच्चारण किया और पूरे विश्व को सनातन संस्कृति से परिचित कराया उन्होंने अपने भाषण के दौरान कहा कि मुझे गर्व है कि मैं ऐसे धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिकता का पाठ पढ़ाया है।

विश्व धर्म सम्मेलन में उनके इस जोरदार भाषण के बाद अमेरिका में उनका बहुत स्वागत सत्कार किया गया।

धार्मिक सम्मेलन खत्म होने के 3 वर्ष बाद भी स्वामी जी अमेरिका में ही रहकर वहां के लोगों को सनातन संस्कृति से परिचित कराते रहे एक अमेरिकी प्रेस में उन्हें इसी दौरान Cylonic Monik from India की उपाधि दी गई।

स्वामी विवेकानंद ने सन 1894 में न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी को स्थापित किया। इसके बाद सन 1896 में वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में गए और वहां मैक्स मूलर से मिले। मैक्स मूलर ने हीं उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जीवनी लिखी थी।

सन 1897 में भारत लौटने के पूर्व उन्होंने अपना कुछ समय श्रीलंका में भी बिताया जहां उनका खूब आदर सत्कार किया गया।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब हुई?

1 मई 1897 को स्वामी विवेकानंद जी भारत वापस लौट आए और यहां आकर उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन की स्थापना का यही उद्देश्य था कि भारत में अस्पताल और शिक्षा के लिए विद्यालय के क्षेत्र में तेजी से कदम बढ़ाया जा सके।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना के पश्चात सन 1898 में स्वामी जी ने बेलूर मठ की स्थापना की।

स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु कब हुई?

स्वामी विवेकानंद जी मधुमेह के रोगी थे अपनी मृत्यु के पूर्व ही उन्होंने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि वह 40 वर्ष से अधिक आयु नहीं जी पाएंगे।

अपने जीवन के आखिरी दिनों में यह बेलूर मठ में ही साधना में लीन रहते थे।

उनके शिष्य कहते हैं कि 4 जुलाई सन 1902 ईस्वी को महज 39 साल की आयु में स्वामी विवेकानंद जी ने महा समाधि ले ली और अपना देह त्याग दिया।

इनकी मृत्यु के पश्चात बेलूर के गंगा घाट पर ही का अंतिम संस्कार किया गया।

इन्हें भी पढ़े :  
1.  नंबी नारायणन का जीवन परिचय (ISRO Scientist Nambi Narayanan ) 
2. महान साहित्यकार रविन्द्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय (Rabindranath Tagore Biography)
3. महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय
4. कारगिल के शेरशाह कैप्टन विक्रम बत्रा का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद जी के अनमोल वचन (Swami Vivekananda quotes)

स्वामी विवेकानंद जी ने अपने शिष्यों को विभिन्न प्रकार के उपदेश दिए हैं आज हम कुछ ऐसे ही अनमोल विचार बताएंगे जिन के माध्यम से स्वामी जी ने अपने संदेश व्यक्त किए हैं।

1. विवेकानंद जी का यह मानना था कि संघर्ष करते हुए कभी भी हार नहीं माननी चाहिए बल्कि सक्रिय होकर तब तक संघर्ष करते रहना चाहिए जब तक सफलता आपके हाथ में न लग जाए।

2. विवेकानंद जी  का मानना था कि मानव जाति के लिए संसार का कोई भी कार्य संभव नहीं है यदि वह अपने हट पर आ जाए तो असंभव को भी संभव कर सकता है वे कहते थे कि इंसान को सदैव असंभव के आगे का सोचना चाहिए ताकि कुछ अ। संभव होने की संभावना ही ना रहे

3. स्वामी जी कहते थे कि विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो हमारे पास नहीं है बस हम अपनी आंखों को अपने हाथ से बंद करके इसलिए निराश है क्योंकि अंधेरा है।

4. स्वामी विवेकानंद जी मानते थे कि सात्विकता व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ आभूषण होती है क्योंकि वह उसके मूल से परिचित कराती है वह अलंकार कभी सुंदर ही नहीं हो सकता जो व्यक्ति के मूल को दबा दें।

5. स्वामी विवेकानंद जी कहते थे कि परोपकार आत्मा की संतुष्टि का सबसे बड़ा मार्ग है परोपकारी कभी निर्धन नहीं हो सकता वह सदैव समृद्ध रहता है फिर चाहे उसके पास भौतिक संपत्ति हो अथवा ना हो।

6. अगर आपको संसार में आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत करना है तो वह अपने मूल को जानो नकी इन भौतिक मायाजाल में गूथे रहो ताकि तुम्हें स्वयं का भी पता ना चले। जैसे जैसे तुम अपने मूल को जानोगे वैसे वैसे तुम्हारा चितत् प्रसन्न रहने लगेगा।

Leave a Comment