Advertisements

रावण के 10+ रहस्य जिन्हें पढ़ने के बाद हैरान रह जाएंगे आप | Unknown Facts about Ravan hindi

दशहरे के अवसर पर जानिए रावण से जुड़े कुछ रोचक तथ्य (Dussehra Unknown Facts about Ravan hindi) रावण कौन था? रावण के दस सिरों का रहस्य क्या हैं?

रामायण भले ही प्रभु श्री राम की कहानी थी लेकिन इसके साथ कई सारे किरदार भी जुड़े हैं जिनमें रावण की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है जिसके संघार के लिए उन्होने जन्म लिया था।

वैसे तो अपने जीवन के शुरुआती दिनों में रावण जैसा प्रकांड विद्वान तीनों लोको में कोई नहीं था लेकिन आगे चलकर अधर्म और अहंकार के प्रभाव में देवताओं से भी पूजनीय ब्राह्मण दैत्य में बदल गया।

Advertisements

दशहरे के दिन प्रभु श्री राम ने राक्षस रावण का वध किया था इसी कारण दशहरा का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में हर साल मनाया जाता है।

हम केवल रामायण कथा के अनुसार ही रावण को समझते हैं लेकिन रामायण के अलावा भी रावण की जीवन से कुछ ऐसे रहस्य जुड़े हुए हैं जिनके बारे में ज्यादातर लोगों को कुछ भी ज्ञात नहीं है।

आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको रावण से जुड़े हुए कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताएंगे जिन्हें शायद आपने पहले कभी नहीं सुना होगा।

इसके अलावा हम आपको रावण के जीवन से जुड़े हुए कुछ रहस्यों के बारे में भी बताएंगे जिन्हें सुनकर आप हैरान हो जाएंगे।

विषय–सूची

रावण से जुड़े अद्भुत व अनसुने रोचक तथ्य (Amazing Unknown Facts about Ravan hindi)

रावण लंका का राजा था जिसने प्रभु श्री राम की पत्नी माता सीता का हरण किया था। रावण त्रिलोक विजेता था। आकाश, पाताल और पृथ्वी तीनो लोक रावण के प्रभुत्व से वंचित नहीं थे।

रावण महर्षि विश्रवा का पुत्र और ऋषि पुलस्त्य का वंशज था। महर्षि विश्रवा ने ही रावण को वेद वेदांत और उपनिषद का पाठ पढ़ाया था। ब्राह्मण कुल में पैदा होकर रावण बहुत बड़ा विद्वान बना। उसके जैसा विद्वान ब्राह्मण तीनों लोगों में कोई नहीं था। लेकिन अधर्म और मद के प्रभाव ने उसे असुर बना दिया।

dussehra-Unknown Facts about Ravana hindi

1. क्या सचमुच रावण के 10 सिर और 20 भुजाएं थी?

वैसे तो रावण को दशानन और दशग्रीव के नाम से जाना जाता है जिसका मतलब 10 सिरों वाला होता है।

लेकिन सोचिए क्या यह संभव हो सकता है कि किसी इंसान के 10 सिर और 20 भुजाएं हों ?

तो आइए जानते हैं कि क्या सचमुच में रावण के दश मुख थे ?

जैन शास्त्रों के मुताबिक रावण अपने गले में नवरत्नों की माला पहनता था। नवरत्नों की स्माला में 9 बड़ी-बड़ी गोलाकार मणियां जड़ी हुई थी जो बेहद चमकदार थी।

कुछ लोगों का मानना है कि नवरत्न माला की मणियों में रावण के नौ अलग-अलग सिर दिखाई देते थे जबकि रावण का वास्तविक सिर केवल एक ही था। यही कारण था कि रावण को देखने पर 10 सिरों का भ्रम पैदा होता था जिस कारण उसे दशानन कहा जाने लगा।

हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि रावण मायावी शक्तियों का राजा था। उसे ऐसी ऐसी मायाएं आती थी जो देवताओं को भी भ्रमित कर दें। इन्हीं मायाओं के बल पर रावण अपने 10 सिरों का भ्रम पैदा करता था और खुद को दशानन और दशशीश कहलवाया करता था।

जबकि कुछ विद्वान यह मानते हैं कि रावण को चारों वेदों और छह दर्शनों का अद्भुत कंठस्थ ज्ञान था इसी कारण उसे दशकंठी कह कर संबोधित किया जाता था। इसलिए कहा जाता है कि दशकंठी नाम के तर्ज पर ही लोग रावण को दशानन कह कर पुकारने लगे।

हालांकि श्री रामचरितमानस में यह साफ-साफ लिखा है कि रावण के 10 सिर थे इसलिए उसे दशानन कहा जाता था। श्री रामचरितमानस में यह भी बताया गया है कि अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रावण प्रभु श्री राम से युद्ध करने के लिए युद्ध स्थल में गया था जिसके बाद अगले 10 दिनों तक प्रभु श्री राम ने अपने बाणों से एक-एक करके रावण के 10 सिर धड़ से अलग कर दिए। इसी दसवे दिन शुक्ल पक्ष की दशमी के अवसर पर भगवान राम ने रावण का वध कर दिया। इस तिथि को कालांतर में विजयदशमी का नाम दिया गया और इस दिन रावण के पुतले का दहन होता है।

2. रावण के जन्म से जुड़ी पौराणिका कहानी- रावण के तीन जन्मों का रहस्य

रावण के बारे में तो हम सबको पता है जिसने त्रेता युग में जन्म लिया। लेकिन शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि रावण ने इस पृथ्वी पर तीन बार जन्म लिया था।

ऐसा माना जाता है कि रावण और उनके भाई कुंभकरण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल थे जिनका नाम जय और विजय था।

बताया जाता है कि एक बार सनक सानंदन और संसद कुमार ऋषि भगवान विष्णु से भेंट करने स्वर्ग लोग पहुंचे लेकिन जय और विजय ने उन्हें भगवान विष्णु के विश्राम का हवाला देकर अंदर जाने से रोक लिया।

लेकिन द्वारपालों के इन आचरण से क्रोधित होकर सनक, सनंदन, सनद कुमार आदि ऋषियों ने उन्हें 3 बार राक्षस योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। क्षमा याचना करने पर ऋषियों ने कहा कि यदि राक्षस योनि में तुम्हारा वध भगवान विष्णु के हाथ होगा तो तुम दोनों इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।

रावण और कुंभकरण का पहला जन्म सतयुग में हुआ जब दोनों भाई हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में पैदा हुए। हिरण्याक्ष के कारण पृथ्वी पाताल लोक में डूब गई थी जिसे बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया और हिरण्याक्ष का वध किया। जबकि हिरण कश्यप का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया था।

इन दोनों भाइयों का दूसरा जन्म रावण और कुंभकरण के रूप में हुआ जो सर्वविदित है। कहां जाता है कि रावण और कुंभकरण का तीसरा जन्म द्वापर युग में हुआ था जहां वह मथुरा नरेश कंस और शिशुपाल के रूप में पैदा हुए थे। इस जन्म में भी भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण का अवतार लिया और दोनों का वध किया तत्पश्चात वह इस श्राप से मुक्त हो गए।

3. ब्रह्मा का वंशज था रावण–

बहुत कम ही लोग जानते होंगे के रावण ब्रह्मा जी के वंशजों में से एक है। रावण के पिता महर्षि विश्रवा और उनके काका महर्षि अगस्त्य दोनों ऋषि पुलस्त्य के बेटे थे। ऋषि पुलस्त्य को पौराणिक ग्रंथों में ब्रह्मा जी का मानस पुत्र माना जाता है। अतः रावण ब्रह्मा जी का ही एक वंशज था।

4. कुंभकरण, विभीषण के अलावा कुबेर को भी माना जाता है रावण का भाई–

रावण के पिता महर्षि विश्रवा ने दो विवाह किए थे। उनका पहला विवाह महर्षि भारद्वाज की पुत्री से हुआ था जिनका नाम इडविदा या इलाविदा  था। धन और लक्ष्मी के लोकपाल कुबेर का जन्म इन्हीं के गर्भ से हुआ था। कुबेर की माता इलाविदा को देववर्णिनी के नाम से भी जाना जाता था।

जबकि महर्षि विश्रवा की दूसरी पत्नी का नाम एक ही था कैकशी था जो राक्षसी ताड़का और राक्षस राज सुमाली की पुत्री थी। कैकशी के गर्भ से ही कुंभकरण विभीषण और रावण का जन्म हुआ था।

यानी कि रावण और कुबेर सौतेले भाई थे। जिनका जन्म पिता विश्रवा की दो अलग-अलग पत्नियों से हुआ था।

आइये इन्हें भी पढ़ें- क्या हैं भीमकुंड का रहस्यकुंड में डूबने वाला व्यक्ति हो जाता है अदृश्य

5. रावण ने प्रभु श्री राम की विजय के लिए कराया था यज्ञ–

जब रामेश्वरम के तट पर पहुंचकर भगवान श्रीराम ने अथाह सागर को देखा तो उनका मन विस्मय में पड़ गया। प्रभु श्री राम शिव की आराधना करने के लिए रामेश्वरम तट पर ही यज्ञ का आयोजन किया ताकि लंका पर उनकी जीत सुनिश्चित हो सके।

कहा जाता है कि प्रभु श्री राम ने यज्ञ करवाने के लिए रावण को आमंत्रण भेजा था। जब रावण को यह आमंत्रण मिला तो वह ब्राह्मण के नैतिक कर्तव्य के निर्वहन के कारण प्रभु श्री राम को मना नहीं कर सका। क्योंकि यह यज्ञ भगवान शिव को समर्पित था इस कारण भी रावण मना नहीं कर सका।

परिणाम स्वरूप रावण ने रामेश्वरम तट पर जाकर प्रभु श्री राम का यज्ञ अनुष्ठान करवाया था जबकि यह यज्ञ अनुष्ठान रावण को पराजित करने के लिए ही किया जा रहा था।

कहा जाता है कि जब यह यज्ञ अनुष्ठान पूरा हो गया तो प्रभु श्री राम ने रावण के चरण स्पर्श किए और उन से विजयी होने का आशीर्वाद मांगा। इस पर रावण ने उन्हें तथास्तु कह कर आशीर्वाद दिया।

6. वीणा बजाने में हासिल थी महारत, रावण ने किया था वीणा का आविष्कार–

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि रावण को वीणा बजाने में महारत हासिल थी। रामायण एक सच्चा संगीत प्रेमी था और अपनी आध्यात्मिक शांति के लिए अक्सर वाद्य यंत्रों को बजाया करता था और संगीत भी सुना करता था।

रावण इतनी वीणा की इतनी मधुर तान छेड़ता था कि स्वर्ग लोक से देवता गण भी उसके वीणा वादन को सुनने के लिए पृथ्वी पर उतर आते थे। वीणा वादक के अलावा रावण एक अविष्कारक भी था। ऐसा माना जाता है कि वीणा का अविष्कार रावण द्वारा ही किया गया था।

7. कालविजयी था रावण –

आसुरी शक्ति के प्रभाव में रामायण अपने मद और अहंकार में चूर था। तीनों लोगों में उसकी आसुरी शक्तियों का प्रभुत्व था देवता गण भी रावण से हमेशा भयभीत रहते थे।

एक बार रावण ने यमलोक पर आक्रमण कर दिया और रावण तथा यमदेव के बीच घोर संग्राम हुआ। इस संग्राम के दौरान क्रोधित होकर यम देव के रावन के वध के लिए काल दंड हाथ में उठा लिया लेकिन उसी समय ब्रह्मा जी वहां प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज को अपने वरदान के बारे में बताया।

ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर यमराज ने अपना काल दंड वापस ले लिया और रावण अपने आप को कालजयी मानने लगा।

8. शनिदेव को बनाया था बंदी –

बाल्मीकि रामायण रामचरितमानस और राधेश्याम रामायण के अनुसार एक बार शनिदेव रावण के पास यह बताने आए थे कि उन की कुदृष्टि रावण पर पड़ने वाली है जिसके बाद साढ़ेसाती की शुरुआत होगी।

साढ़ेसाती लगने की बात सुनते ही रावण क्रोध से लाल हो उठा और उसने तुरंत शनिदेव को अपना बंदी बना लिया और कहा की पहले तुम्हे साढ़े साती भुगतनी पड़ेगी। बाद में जब हनुमान जी लंका आए और लंका दहन के दौरान उन्हें पता चला कि शनि देव रावण द्वारा बंदी बनाए गए हैं तो उन्होंने शनिदेव को आजाद कराया इसके बदले में शनि देव ने लंका दहन में हनुमान जी की मदद भी की।

9. ग्रह नक्षत्रों की स्थिति बदल देता था रावण–

रावण चाहता था कि उसके कुल का पतन कभी न हो इसलिए वह ग्रह नक्षत्रों को भी अपनी स्थितियां बदलने के लिए मजबूर कर देता था।

जन्म के पहले जब रावण का बेटा मेघनाथ उसकी पत्नी मंदोदरी के गर्भ में था तो रावण ने उसे अमर बनाने के लिए ग्रहों की स्थितियों को काबू में लाने की कोशिश की। सारे नक्षत्र इतने भयभीत हो गए कि वह रावण के दिए हुए आदेशों का पालन करने लगे और एक ही स्थिति में आ गए।

लेकिन शनि देव ने इस बात की गंभीरता समझते हुए रावण के आदेश के विपरीत जाकर अपनी स्थिति बदल दी जिसके कारण रावण अपनी मंशा में असफल हो गया। ऊपर हमने आपको यह भी बताया कि रावण ने कैसे शनि देव को अपना बंदी बना लिया था।

10. रावण ने की थी कई ग्रंथों की रचनाएं –

रावण ने अपने जीवन काल में कई सारे ग्रंथों की रचनाएं की थी। आपने शिव तांडव स्त्रोत का पाठ तो सुना ही होगा इसका रचयिता कोई और नहीं बल्कि रावण ही था। शिव तांडव स्त्रोत के जरिए रावण ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति की थी।

इसके अलावा रावण ने अरुण संहिता की रचना भी की थी जिसे लाल किताब के नाम से जाना जाता है। इस किताब में मुख्य रूप से जन्म कुंडली और हस्तरेखा के बारे में जानकारियां दी गई हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि रावण ने ही रावण संहिता की रचना की थी जिसे ज्योतिष विज्ञान और उससे जुड़ी हुई जानकारियों का भंडार माना जाता है।

आइये इन्हें भी पढ़ें-

11. महीने तक बालि की काँख में बंदी थे रावण –

भले ही रावण बहुत शक्तिशाली था और तीनों लोकों पर विजयी माना जाता था लेकिन रावण को भी कई राजाओं ने पराजित किया था।

रामायण के अनुसार किष्किंधा के राजा बालि ने 6 महीने तक रावण को अपनी काँख में दबा कर रखा था। हालांकि रावण ने अपनी कुटिल बुद्धि का इस्तेमाल करके बाद में किष्किंधा नरेश बालि अपना मित्र बना लिया था।

12. सहस्त्रार्जुन ने बख्श दिए थे प्राण –

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि माहिष्मती पुरी के राजा सहस्त्रार्जुन ने युद्ध के दौरान रावण को बंदी बना लिया था।

माहिष्मती पुरी बहुत सुंदर और आकर्षक नगरी थी जहां राजा सहस्त्रार्जुन राज करते थे। इस नगरी पर अधिकार जमाने के लिए रावण ने आक्रमण कर दिया था। लेकिन युद्ध के दौरान सहस्त्रार्जुन ने बड़ी आसानी से रावण को हरा दिया और बंदी बना लिया।

सहस्त्रार्जुन चाहता तो रावण को जान से मार भी सकता था। लेकिन वह क्षत्रिय कुल से था जो महर्षि पुलस्त्य की पूजा करते थे। अगर वह रावण की हत्या कर देता तो उसे ब्रह्महत्या का पाप लग जाता और दूसरे अपने कुल गुरू पुलस्त्य का वंषज होने के कारण उसने रावण को छोड़ दिया।

श्राप के कारण रावण ने सीता माता से कभी नहीं की जबरदस्ती–

रावण इतना बलशाली था फिर भी वह जबरन सीता जी को अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सका। दरअसल रावण को नलकुबेर की प्रेयसी ने यह श्राप दिया था कि वह अगर स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे छूने का प्रयास करेगा तो उसके सिर के सात टुकड़े हो जाएंगे।

रावण ने उस अप्सरा को अपनी आसुरी प्रवृत्ति का शिकार बनाया था जिस पर क्रोधित होकर उसने रावण को श्राप दिया था। यही कारण था कि रावण हमेशा विनम्र होकर सीता माता को मानने की कोशिश करता था। हालांकि कई बार वह क्रोध में भी आ जाता था लेकिन श्राप के कारण उसने सीता जी से कभी जबरदस्ती नहीं की।

Homepage Follow us on Google News

FAQ

रावण को दशानन क्यों कहा जाता है ?

क्योंकि रावण के 10 सिर थे इस कारण उसे दशानन कहा जाता है।

रावण के माता पिता का नाम क्या था?

रावण के पिता का नाम महर्षि विश्रवा और माता का नाम कैकशी था।

रावण किस कुल में पैदा हुआ था ?

रावण का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह ऋषि पुलस्त्य का वंशज था जिन्हें ब्रह्मा का पुत्र माना जाता है यानी कि रावण स्वयं ब्रह्मा देव का वंशज था।

रावण को बंदी किसने बनाया था ?

रावण को किष्किंधा के राजा बालि ने बंदी बनाया था और अपनी कांख में दबाकर 6 महीने तक रखा था।

रावण का जीवन किस अंग में था ?

रावण का जीवन उसकी नाभि में था जहां बाण से मारकर प्रभु श्री राम ने उसका वध किया।

रावण के कितने भाई बहन थे?

रावण के दो सगे भाई और एक सगी बहन थी जिनका नाम विभीषण कुंभकरण और सूर्पनखा था। हालांकि इसके अलावा उनका एक सौतेला भाई भी था जिसका नाम कुबेर था।

Leave a Comment