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लोहड़ी पर निबंध, कब और क्यों मनाया जाता है लोहड़ी, जानिए क्या है इसका इतिहास और महत्व | Essay on Lohri Festival 2023 and History Facts in Hindi

लोहड़ी पर निबंध (Lohri Festival 2023) : भारत सनातन संस्कृति, रीति-रिवाजों और त्योहारों की भूमि है। यहां आए दिनों कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता रहता है। खासकर जनवरी के मध्य महीने में देश के कई हिस्सों में मकर संक्रांति की तर्ज पर विभिन्न त्योहार मनाए जाते हैं इन्हीं त्योहारों में से लोहड़ी भी एक है।

भारत में पतंगों का त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जैसे कि मकर संक्रांति के मौके पर दक्षिण भारत के तमिलनाडु में पोंगल, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, तथा उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति मनाई जाती है ठीक वैसे ही हरियाणा और पंजाब प्रांत में इस मौके पर लोहड़ी मनाई जाती है।

यह सभी त्यौहार मुख्यतः पतंगों के त्यौहार में गिने जाते हैं जिन्हें मकर संक्रांति के साथ अथवा इर्द-गिर्द मनाया जाता है। मकर संक्रांति पोंगल और उत्तरायण के साथ-साथ लोहड़ी का भी खेतों की कृषि और फसलों से विशेष संबंध होता है।

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तो चलिए आज आपको इस आर्टिकल के जरिए लोहड़ी पर निबंध (Essay on Lohri Festival in Hindi) तथा लोहड़ी का इतिहास एवं महत्व (Lohri Festival History and Significance in Hindi) के बारे में बताते हैं।

लोहड़ी पर निबंध | Essay-on-Lohari-Festival-in-hindi

लोहड़ी पर निबंध, जानिए क्या है इसका इतिहास और महत्व (Essay on Lohri Festival 2023 and History Facts in Hindi)

कब और क्यों मनाया जाता है लोहड़ी का त्यौहार?

लोहड़ी का त्यौहार मकर संक्रांति के एक दिन पहले अथवा मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार मुख्य रूप से पंजाब प्रांत के हिस्सों में मनाया जाता है जिसमें भारत के पंजाब और हरियाणा राज्य शामिल हैं।

वैसे तो भारत में मकर संक्रांति की तिथि 14 जनवरी अथवा 15 जनवरी को पड़ती है। ऐसे में मकर संक्रांति के साथ-साथ लोहड़ी की तिथि भी आगे पीछे होती रहती है क्योंकि इसे मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को ही मनाया जाता है।

इसलिए लोहड़ी का त्यौहार मकर संक्रांति के हिसाब से कभी 13 जनवरी तो कभी 14 जनवरी के दिन पड़ता है। लोहड़ी के त्यौहार के साथ कई सारी पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं जिन्हें आज भी उतनी ही मान्यता दी जाती है लेकिन इसका ऐतिहासिक संदर्भ में मौजूद है।

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लोहड़ी का इतिहास (History of Lohri Festival)

मुगल शासक अकबर के शासन काल में पंजाब प्रांत का एक सरदार हुआ करता था जिसका नाम दुल्ला भट्टी था। दुल्ला भट्टी धनी और अत्याचारी लोगों को लूटता था जबकि निर्धनों और असहायों के प्रति सहानुभूति दिखाता था।

कहा जाता है कि एक बार एक निर्धन की दो अनाथ बेटियों को उनका चाचा विवाह करने की बजाय उन्हें बेचना चाहता था। दुल्ला भट्टी ने इन लड़कियों के व्यापार का विरोध किया और उन दोनों लड़कियों को मुक्त करा कर विवाह किया। कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी ने जंगल में आग जलाकर दोनों लड़कियों का विधिवत विवाह किया और खुद ही उनका कन्यादान भी किया। लोहड़ी के उपलक्ष में गाए जाने वाले गीतों में भी दुल्ला भट्टी का जिक्र जरूर होता है।

लोहड़ी त्यौहार से जुड़ी पौराणिक कथाएं –

दुल्ला भट्टी के ऐतिहासिक संदर्भ के अलावा लोहड़ी के त्यौहार से कई सारी पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं जिन्हें विशेष मान्यता दी जाती है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार लोहड़ी का त्यौहार सती के त्याग का प्रतीक है। पुराणों में उल्लेख है कि जब दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री सती के पति और भगवान शिव का अनादर किया था तो देवी सती ने क्रोधित होकर अपने शरीर का त्याग कर दिया था और स्वयं अग्नि में जल गई थी।

कुछ लोग मानते हैं कि तभी से इस घटना के पश्चाताप के रुप में लोहड़ी मनाई जाने लगी। और शायद यही कारण भी है कि लोहड़ी के त्यौहार को बहन बेटियों का त्यौहार भी माना जाता है। और इस दिन खासकर बहन बेटियों को अपने घर बुलाकर सिंगार के सामान और उपहार भेंट किए जाते हैं।

हालांकि लोहड़ी से जुड़ी हुई कुछ और मान्यताएं भी प्रचलित हैं। एक दूसरे मान्यता के अनुसार माना जाता है कि लोहड़ी के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता नाम की राक्षसी का वध किया था। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के 1 दिन पहले की रात्रि को कंस ने लोहिता नाम की राक्षसी को भगवान श्री कृष्ण की हत्या करने के लिए भेजा था जिसका भगवान श्री कृष्ण ने वध कर दिया था। इसीलिए कहा जाता है कि तभी से लोहड़ी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

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कैसे मनाया जाता है लोहड़ी का त्यौहार?

पंजाब प्रांत के लोगों के लिए लोहड़ी का बहुत विशेष महत्व होता है और वह बड़ी धूमधाम से इस त्यौहार को मनाते हैं। लोहड़ी की तैयारियां कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती हैं।

छोटे बच्चे लोहड़ी के कुछ दिन पहले से ही आग जलाने के लिए लकड़ियां आदि इकट्ठा करने लगते हैं। लोहारी की शाम को इकट्ठा की गई इन लकड़ियों से आग जलाई जाती है और इस आग के चारों ओर नाचते गाते हुए लोग रेवाड़ी मूंगफली और मक्के जैसी चीजों की आहुति देते हैं।

खासकर जिस घर में नई शादी हुई हो या फिर बच्चे पैदा हुए हो, उन्हें लोहड़ी के दिन विशेष रूप से बधाई दी जाती है। घर में नव बधू और नवजात शिशु के लिए पहली लोहड़ी का बहुत खास महत्व होता है। पहले लोहड़ी को तिलोड़ी के नाम से भी जाना जाता था।

लोहड़ी के दिन परिवार और समाज के लोग एक साथ इकट्ठा होकर अलाव के चारों ओर पारंपरिक गीत संगीत गाते हैं और नाचते भी हैं। लोहड़ी के मौके पर खासकर गजक, मूंगफली और रेवड़ी खाई जाती है। इस मौके पर चने का साग और मक्के की रोटी का भोजन भी काफी लोकप्रिय है।

जैसा कि हमने आपको पहले ही बताया होली का त्यौहार बहन बेटियों का त्योहार माना जाता है क्योंकि इस दिन घर से विदा हुई बहन बेटियों को घर पर बुलाया जाता है। देवी सती के त्याग से जुड़ी हुई घटना का पश्चाताप करने के तौर पर अपनी बहन बेटियों और उनके परिवार को बड़े सम्मान और आदर के साथ भोजन पर बुलाया जाता है तथा उन्हें उपहार स्वरूप श्रृंगार के साधन सामान भेंट किए जाते हैं।

लोहड़ी 2023 कब है?

इस साल भी पंजाब और हरियाणा समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में मकर संक्रांति के दिन पहले लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाएगा। इस बार मकर संक्रांति की तिथि 15 जनवरी 2023 को पड़ रही है, यानी कि 15 जनवरी के दिन भगवान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसीलिए लोहड़ी का त्यौहार मकर संक्रांति के 1 दिन पहले 14 जनवरी 2023 की शाम को मनाया जाएगा।

तो दोस्तों आज इस आर्टिकल के जरिए हमने आपको लोहड़ी से जुड़ी हुई सारी जानकारियां दी। उम्मीद करते हैं कि यह आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया होगा।

FAQ

2023 में लोहड़ी कब मनाई जाएगी?

14 जनवरी 2023 की शाम को मनाई जाएगी।

लोहड़ी का त्यौहार मुख्यतः कहां मनाई जाती है?

पंजाब और हरियाणा प्रांत में

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