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भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी । Freedom Fighters of India in hindi

हेलो दोस्तों आज के इस लेख में हम स्वतंत्रता सेनानियों (Freedom Fighters of India in hindi) के बारे में जानेंगे। जिन्होंने अपने प्राण की परवाह न करते हुए हमारे देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाई। ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिनके बारे में हर एक भारत वासियों को जानना चाहिए। जैसा कि हम सब जानते हैं हमारा देश 15 अगस्त 1947 में आजाद हुआ था और इस आजादी पर हम सभी भारतवासियों को नाज है। 15 अगस्त वो दिन है जिस दिन बच्चे अपने स्कूल में झण्डा फहराया करते हैं, देशभक्ति के गीत गाते हैं और इन महान हस्तियों को याद करके श्रद्धांजलि देते हैं।

भारत के स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighters of India in hindi)

आज के इस लेख पर हम ऐसे से स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानेंगे जिन्होंने अकेले अपने दम पर अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी और अंत में देश को अंग्रेजी मुल्क से आजादी दिलाई। तो चलिए जानते हैं भारत मां के ऐसे जवान शहीदों के बारे में जो अपने देश के लिए (हमारे लिए) अपनी जान न्योछावर कर दिए।

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1. रानी लक्ष्मी बाई (Rani Laxmi Bai)

झांसी की रानी नाम से मशहूर रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 1828 में बनारस (काशी) के ब्रहाम्ण मराठी परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम मणिकर्णिका था उन्हें बचपन में प्यार से मनु कहकर पुकारते थे। देश को आजादी दिलाने के लिए झांसी की रानी का सहयोग बहुत ही बड़ा था। इनका विवाह सन् 1842 मे हुआ था।

‘‘झांसी की रानी’’ की उपाधि कैसे मिली:-

रानी लक्ष्मी बाई जब बड़ी हुई तो उस समय ब्रिटिश इंडिया के गर्वनर डलहौजी था। उसने सारी रियासतों में ऐलान कर दिया था कि जिस राज्य का राजा जीवित नहीं होगा। वहां पर अंग्रेजो का शासन चलेगा। इस समय रानी लक्ष्मी बाई विधवा थी और इन्होंने एक पुत्र को गोद भी लिया था जिसका नाम दामोदर था। अपनी झांसी को बचाने के लिए रानी लक्ष्मी बाई ने इनके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। क्योंकि इनको अंग्रेजो के सामने झुकना मंजूर नहीं था। ये युद्ध 1858 में हुआ था जो 2 हफ्ते तक चला था और उन्होंने इसमें काफी संघर्ष किया था। हालांकि ये उस युद्ध को हार गई थी और ग्वालियर के लिए प्रस्थान किया था वहां पर इन्होंने फिर एक युयद्ध लड़ा था। अपने जीवन में इन्होंने इतने युद्ध लड़े की इनका नाम ‘‘झांसी की रानी’’ पड़ गया। ये भारत की वीर बेटियों मे से एक थी।

2. मंगल पांडेय (Mangal Pandey)

भारत को अंग्रेजो से आजादी दिलाने के लिए सबसे पहली नीव मंगल दिवाकर पाण्डेय ने ही रखी थी। जी हां इनका पूरा नाम मंगल दिवाकर पाण्डेय था। इनका जन्म 19 जुलाई सन् 1827 मे उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था। 1857 में जो क्रांति छिड़ी थी वे इनकी देन थी। हालांकि इनकी क्रांति से आजादी तो नहीं मिल पाई थी पर आशा की छोटी सी किरण सबके हृदय में जग गई थी। मंगल पांडे जी ने एक ही लक्ष्य के साथ कार्य किया जिसमे हर कार्य भारत को आजादी दिलाने का था। वे भारत के ऐसे वीर सपूत थे जिन्होंने अकेले अपने दम पर ब्रिटिश अफसर के ऊपर हमला बोल दिया था। जिसके कारण उन ब्रिटिश दुष्टों ने उन्हें 8 अप्रैल सन् 1857 मे फांसी पर लटका दिया था।

3. चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad)

चंद्रशेखर आजाद जी का जन्म 23 जुलाई 1906 मे भाँवरा नामक गांव में हुआ था। इन्होंने भारत की आजादी के लिए नौजवानों कि सेना बनाई और उनके हृदय में देश भक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। इनके पिता जी का नाम पंडित सीताराम तिवारी और इनकी माता का नाम जगरानी देवी था।

इनका एक नारा जो सबसे हट के था वो ये कि ‘जब तक एक क्रांतिकारी के हाथ में पिस्तौल है तब तक कोई आपको जिंदा नहीं पकड़ सकता था’ देश की आजादी मे चंद्रशेखर आजाद जी का बहुत बड़ा योगदान था। अंग्रेजो के हृदय में इनका खौफ बहुत ज्यादा था। लेकिन इनकी एक इच्छा ये थी कि चंद्रशेखर अंग्रेजो के हाथो नहीं मरना चाहते थे। इसलिए उन्होंने खुद को गोली मार ली थी और शाहिद हो गए थे। इनकी मृत्यु सन् 27 फरवरी 1931 मे हुई थी।

सम्पूर्ण जीवन जीवन परिचय  महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

4. भगत सिंह (Shaheed Bhagat Singh)

भगत सिंह जी का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले, बंगा पंजाब में हुआ था। भगत सिंह के रग-रग में देशभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह उस समय के युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत्र थे एक आर्दश स्थापित करके गए। इनके पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। पूरे परिवार में ही देशभक्ति की लहर दौड़ती थी। इनके, दादाजी, पापाजी और चाचाजी सबने देश की आजादी मे भाग लिया था। इसलिए इनके सभी विचार बचपन से ही क्रांतिकारी थे और देश भक्ति की नीव बचपन में ही पड़ गई थी।

1919 में हुए जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें अंदर से झकझोर कर रख दिया था कि उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और भारत की स्वाधीनता दिलाने के लिए नौजवान भारत सभा की नींव रखी।

23 मार्च 1931 को उन्हें और उनके दो क्रांतिकारी साथियों (राजगुरु और सुखदेव) को फांसी दे दी गई।  केवल 23 वर्ष की छोटी सी आयु में बहुत बड़े-बड़े कार्य करते हुए उन्होंने हंसते-हंसते देश की स्वाधीनता के लिए अपने प्रांण न्यौछावर कर दिये।

5. सुभाषचंद्र बोस (Subhash Chandra Boss)

नेताजी के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चंद्र बोस जी का जन्म सन् 23 जनवरी 1897 मे उड़ीसा में हुआ था। इन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आजाद हिन्द फौज नामक संस्था का गठन किया। इसके अलावा इन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए आईसीएस की नौकरी का त्याग कर दिया था। ये विचारो से काफी उग्र थे और गांधीजी के अहिंसा आंदोलन के खिलाफ रहते थे इसी वजह से हिटलर से सहायता मांगने जर्मनी भी गए थे।

इनके उग्र विचारो के चलते ब्रिटिश सरकार ने कई बार इनको जेल में भी डाला था पर नेताजी के परम उद्देश्य से वे लोग उन्हें विमुख नहीं कर पाए। इसके अलावा पूर्व में ये 1919 मे पढ़ाई के विदेश चले गए थे। तब वहां पर उनको जलियांवाला बाग हत्याकांड का पता चला जिसके चलते 1921 में वापस भारत आ गए और भारतीय कांग्रेस ज्वाइन की। ऐसा माना जाता है 17 अगस्त सन् 1945 में इनकी मृत्यु एक प्लान क्रैश मे हुई थी।

सम्पूर्ण जीवन जीवन परिचय सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी नारे एवं विचार

6. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)

महात्मा गांधी जो पूरे भारत के लिए राष्ट्रपिता और बच्चो के लिए बापू के नाम से प्रसिद्ध है। महात्मा गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 में गुजरात के पोरबंदर जिले में हुआ था। बापूजी के महान कार्यों के कारण ही हमारा देश आजादी की नई बुनियाद कायम कर पाया था। उनके बलिदान को कोई भी भारतवासी कभी नहीं भूल पाएगा। इन्होंने अपने जीवन में हमेशा सत्य और अहिंसा का ही पालन किया था। अहिंसा को ही अपना हथियार बनाकर बापू ने कई सारे आंदोलन लड़े थे और ब्रिटिश शासकों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था और उन्होंने 15 अगस्त सन् 1947 मे भारत देश छोड़ दिया था।

बापूजी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। पिताजी का नाम करमचंद गांधी और माता जी का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी जी अपने जीवन में केवल स्वतंत्रता के लिए ही मशहूर नहीं थे अपितु इन्होंने अपने जीवन में लेखकी, पत्रकार, और समाज सुधारक का कार्य भी कुशलता से किया है। 30 जनवरी सन् 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

7. जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru)

जवाहर लाल नेहरू जी हमारे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और इनको बच्चो से बहुत स्नेह था। इसलिए इनका जन्म दिन हर बच्चो के लिए समर्पित है जिसको हर कोई चिल्ड्रेन डे (बाल दिवस) के रूप में मनाते है। जवाहरलाल  नेहरू भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

इनका जन्म 14 नवंबर 1889 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में हुआ था। महात्मा गांधी जी से प्रेरित होकर व उनके संपर्क में आने से इनके मन में देश को स्वतंत्र करवाने की तीव्र इच्छा जागृत हुई और देश के स्वतंत्रता आंदोलन में इन्होंने भी भाग ले लिया और उनके साथ मिलकर ब्रिटिश के खिलाफ खड़े रहे। इनकी आखरी इच्छा थी कि इनके मारने के बाद इनकी अस्थियां इलाहाबाद के संगम में विसर्जित कर दी जाएं। और इनका निधन 27 मई 1964 मे दिल्ली में हुआ था।

8. लाल बहादुर शास्त्री जी (Lal Bahadur Shastri)

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में वाराणसी (काशी) के नजदीक, मुगलसराय, यूपी में हुआ था। शास्त्री जी आजाद भारत के द्वितीय प्रधानमत्रीं भी बने। काशी विद्यापीठ से उन्हें शास्त्री की उपाधि मिली।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के सभी प्रमुख आंदोलनों असहयोग आंदोलन(सन 1921), दांढ़ी मार्च (सन 1930), भारत छोड़ो आंदोलनों(1942) में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वह गांधीवादी विचारधारा से बहुत प्रभावित थे। आजादी की लड़ाई में वह कई बार जेल भी गये। इसके चलते उन्होंने अंग्रेजो के लिये भारत छो़डो, भारतवर्ष के देशभक्तों के लिये ‘करो या मरो’ व ‘मरो नहीं मारों’ का नारा दिया था और एक आजादी की क्रांतिकारी ज्वाला भी जला दी थी। उनका निधन दिल का दौरा पड़ने की वजह से 11 जनवरी 1966 को उनका निधन हो गया।

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9. सरदार बल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel)

इनको भारत के लौह-पुरुष के नाम से जाने जाते थे। इन्होंने भारत की 600 रियासतों को एक सूत्र में जोड़कर भारत में मिलाने का कारनामा कर दिखाया था। इन्होंने अपनी सूझबूझ और कुशार्ग बुद्धि के बलबूते सभी रियासतों के सरदारों को मना लिया था। 31 अक्टूबर 1875 को उनका जन्म गुजरात के खेड़ो जिले में हुआ। वह पेशे से वकील थे। वह गांधी जी के अंहिसा की नीति से बहुत प्रभावित थे। स्वतंत्रता के सभी आंदालनों जैसे भारत छोड़ों आंदोलन, दांडी मार्च, स्वराज व असहयोग आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के पश्चात सरदार बल्लभ भाई पटेल भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और प्रथम गृहमंत्री बनेे। इनका निधन 15 दिसंबर 1950 का दिल का दौरा पड़ने से हो गया।

10. लाला लाजपत राय जी (Lala Lajpat Rai)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के तीन महान नायकों की त्रिमूर्ति लाल-बाल-पाल के प्रमुख नायक थे। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के धुड़ी गांव में हुआ था। उन्हें पंजाब केसरी के नाम से भी जाना जाता था। उन्होनं अपना पूरा जीवन देश के आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। इनमें नेतृत्व शक्ति गजब की थी इनके भाषणों में बहुत ही प्रभावशाली शक्ति थी।

जलियावाला बाग कांड के बाद उन्हें बहुत ही धक्का लगा था इसके बाद उन्होनें साइमन कमीशन का घोर विरोध प्रर्दशन किया इसमें वह बुरी तरह घायल हो गए और इसके बाद 17 मई 1928 लाहौर में उनकी मृत्यु हो गई। आइये जानते है लाला लाजपत राय जीवन का जीवन परिचय

11. बाल गंगाधर तिलक (Bal Ganga Dhar Tilak)

आधुनिक भारत के निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अहम भूमिका थी। स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है यह नारा उन्होंने ही दिया था उनके भाषण के यह शब्द बहुत लोकप्रिय हुये। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सिपाही थे।

बाल गंगाधर तिलक जी का जन्म एक ब्रहाम्ण परिवार में 23 जुलाई 1856 के दिन रत्नागिरी जिले में स्थित गांव चिखली, महाराष्ट्र में हुआ। पूर्ण स्वराज की मांग उनके द्वारा ही की गई थी उनके इस नारे ने अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी। तिलक जी गरम दल के नेता थे। लाल-बाल-पाल में लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्रपाल और बालगंगाधर तिलक प्रमुख नेता थे।

भारतवासी प्यार से उन्हें ‘लोकमान्य तिलक’ के नाम से पुकारते थे। जिसका अर्थ है समाज के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति। उनकी मृत्यु 1 अगस्त 1920 मुम्बई में हुई।

12. विपिन चन्द्र पाल (Vipin Chandra Pal)

भारत के प्रमुख क्रांतिकारियो में इनका प्रमुख स्थान था वह लाल-बाल-पाल में प्रमुख थे। विपिन चन्द्र पाल जी का जन्म 7 नवंबर 1858 हबीबगंज (बंगलादेश वाले क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता रामचंद्र पाल फारसी के विद्वान व एक जंमीदार थे। यह उन महान विभूतियों में एक है जिन्होंने आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। 1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान था। उन्हें क्रांतिकारी विचारों का जनक कहां जाता है। वह एक शिक्षक, लेखक और समाजसुधारक व पत्रकार थे। वह जातिवाद, सामाजिक कुरीतियों, रुढ़िवादिता के घोर विरोधी थे। 20 मई 1932 को इस महान क्रांतिकारी का कलकत्ता में निधन हो गया।

13. अशफाक उल्ला खान (Ashfaqulla Khan)

राम प्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर काकोरी कांड को अंजाम देने वाले अशफाक उल्ला खान भारत के साहसी और निर्भय क्रांतिकारी थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए शुरू की गई क्रांति की अग्नि में अपने प्राणों की आहुति तक दे दी।

एक क्रांतिकारी और भारत माता के सच्चे सेवक होने के साथ-साथ अशफाक उल्ला खान उर्दू के कवि भी थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश भक्ति से संलिप्त कई सारी कविताएं भी लिखी।

अशफाक उल्ला खान 22 अक्टूबर 1900 में उत्तर प्रदेश में पैदा हुए थे। बाल्यावस्था से ही उनकी सोच क्रांतिकारी थी वह गांधीजी के अहिंसा बाद के पक्षधर नहीं थे बल्कि उनका मानना था कि अंग्रेजों से लोहा लेकर ही उन्हें इस देश से निकाला जा सकता है।

भारत के अमर शहीद अशफाक उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल बहुत अच्छे मित्र थे जिन्होंने अपने और अपने साथियों के क्रांतिकारी आंदोलन को सुदृढ़ बनाने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साथ मिलकर काकोरी में ट्रेन लूटने की योजना बनाई थी।

लिहाजा शहीद अशफाक उल्ला खान राम प्रसाद बिस्मिल और उनके आठ अन्य साथियों ने मिलकर 9 अगस्त 1925 के दिन ट्रेन में अंग्रेजों द्वारा ले जाए जा रहे खजाने को लूट लिया। हालांकि काकोरी कांड को अंजाम देने के कुछ दिनों बाद यह अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए और कारावास के दौरान ही महज 27 साल की उम्र में 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद के जेल में इन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

14. राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil)

आजादी के लड़ाई के नायकों में राम प्रसाद बिस्मिल का नाम भी अमर है जिन्होंने अपने मित्र सहयोगी अशफाक उल्ला खान के साथ मिलकर काकोरी कांड को अंजाम दिया था।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल एक आदर्शवादी निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपनी जान की बाजी लगा दी और स्वतंत्रता के इतिहास के पन्नों में अमर हो गए।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में हुआ था। यह वही शाहजहांपुर है जहां पर आजादी की लड़ाई में अपनी बलि देने वाले राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और रोशन सिंह पैदा हुए थे और एक ही दिन भारत माता के तीनों वीर सपूत उनकी गोदी में चिर निद्रा को प्राप्त हो गए।

राम प्रसाद बिस्मिल जी ने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना भी की थी। राम प्रसाद बिस्मिल एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ हिंदी उर्दू के कवि भी थे जिन्हें अंग्रेजी भाषा का भी बखूबी ज्ञान था।

अपने क्रांतिकारी जीवन के दौरान इन्होंने देश प्रेम से संलिप्त सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है जैसी यादगार कविता भी लिखी थी। काकोरी कांड का मास्टरमाइंड होने के साथ-साथ मैनपुरी षडयंत्र का दोष लगाकर अंग्रेज सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया।

19 दिसंबर 1927 उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जेल में राम प्रसाद बिस्मिल जी को फांसी दे दी गई। यह दिन भारत के स्वतंत्रता इतिहास का वह काला दिन है जब भारत के 3 महान सपूत एक साथ इस दुनिया को अलविदा कह गए।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल से जुड़ी हुई एक कहानी काफी चर्चित है कहा जाता है कि जब उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी तो उनकी मां ने गांव में आसपास के लोगों को मिठाइयां बांटी थी। जब गांव वालों ने खुशी का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका बेटा अपनी मातृभूमि के लिए जीवन का बलिदान दे रहा है।

15. शहीद उधम सिंह (Shaheed Udham Singh)

13 अप्रैल 1919 का दिन भारत के इतिहास के पन्नों में दर्ज है और अंग्रेजों की क्रूरता और बर्बरता का जीता जागता प्रमाण है। इस दिन जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था जिसमें हजारों निर्दोष मारे गए थे।

इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड जनरल डायर था जिसने जलियांवाला बाग में निहत्थे निर्दोष आंदोलनकारियों पर गोलियों की बौछार करवा दी थी और उन सब को मौत के घाट उतार दिया था। इस हत्याकांड के दौरान शहीद उधम सिंह भी वहीं मौजूद थे जिन्होंने अपनी आंखों के सामने हजारों निर्दोष निहत्थे आंदोलनकारियों को मरते हुए देखा।

निर्दोषों की निर्मम हत्या के प्रतिशोध की ज्वाला लिए हुए शहीद उधम सिंह ने उसी दिन यह संकल्प लिया कि जनरल डायर की हत्या अब उनके जीवन का मात्र एक उद्देश्य है।

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनम गांव में हुआ था। 13 मार्च 1940 को शहीद उधम सिंह ने लंदन में जनरल डायर की गोली मारकर हत्या कर दी और जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रतिशोध लिया। 31 जुलाई 1940 को महज 41 साल की उम्र में भारत का यह वीर सपूत इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।

आइये जानते है – शहीद उधम सिंह का जीवन परिचय

16. शिवराम राजगुरु (Shivram Rajguru)

24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे में जन्मे शिवराम राजगुरु एक वीर क्रांतिकारी और भगत सिंह के साथी थे। शिवराम राजगुरु हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे और काफी उग्र विचारधारा के क्रांतिकारी थे।

वह अंग्रेजों के साथ लड़ाई में हिंसा बाद के बिलकुल खिलाफ थे। उनका मानना था कि क्रांति और प्रतिशोध से ही अंग्रेजों का सामना किया जा सकता है और उन्हें जड़ से उखाड़ फेंका जा सकता है।

दिल्ली की असेंबली में बम विस्फोट के लिए भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु तीनों उत्तरदाई थे। इसके अलावा शिवराम राजगुरु को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी को मारने के लिए भी जाना जाता है। इन्होंने आजादी की लड़ाई में भगत सिंह और सुखदेव थापर के साथ मिलकर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और 1 दिन अंग्रेजों के हथकंडे में आकर गिरफ्तार हो गए।

गिरफ्तारी के बाद 23 मार्च 1931 को महज 23 साल की अल्पायु में इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ लाहौर जेल में फांसी दे दी गई।

आइये जानते है – शिवराम राजगुरु का जीवन परिचय

17. शहीद सुखदेव थापर (Shaheed Shukhdev Thapar)

दिल्ली की असेंबली में बम विस्फोट करने वाले क्रांतिकारियों में भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के अलावा शहीद सुखदेव थापर भी शामिल थे। सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु तीनों बहुत अच्छे मित्र थे।

सुखदेव थापर 15 जुलाई 1907 को पंजाब के लुधियाना में पैदा हुए थे। इन्होंने शिवराम राजगुरु और भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेज के पुलिस अधिकारी सांडर्स के हत्याकांड में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

लेकिन 23 मार्च 1931 को महज 24 साल की उम्र में इन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया यह वही काला दिन है जिस दिन लाहौर जेल में भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु तीनों को एक साथ फांसी दी गई और तीनों ही सच्चे सपूत भारत माता की गोदी में निद्रा लीन हो गए।

18. खुदीराम बोस (Khudiram Bose)

भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए न जाने कितने युवाओं ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। जीवन की व्यवस्था जिसमें यौवन फूटता है, उसी अवस्था में भारत माता के कई वीर सपूत चिर निद्रा में सो गए।

भरी जवानी में ही देश की आजादी के लिए लड़ते हुए शहीद होने वाले खुदीराम बोस भारत के सबसे युवा क्रांतिकारी थे। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर सन 1889 को हबीबपुर में हुआ था। आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दौर में ही यह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। कहा जाता है कि खुदीराम बोस इतने बड़े देश प्रेमी और क्रांतिकारी थे कि स्कूल में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने अपने अध्यापक से एक रिवाल्वर मांग ली थी ताकि वह अपने जीवन की रक्षा कर सके और अंग्रेजों से लोहा ले सकें।

महज 16 साल की उम्र में ही उन्होंने पुलिस दफ्तरों और कई अन्य सरकारी दफ्तरों पर बम ब्लास्ट किए। इन हमलों के दौरान उन्होंने मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड पर बम से हमला किया था।

11 अगस्त 1908 को बम विस्फोट का दोषी करार करते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने खुदीराम बोस को फांसी दे दी। जिस दिन इन्हें फांसी दी गई थी उस दिन इनकी उम्र महज़ 18 साल 7 महीने 11 दिन थी। वह देश के एक ऐसे सच्चे सपूत थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि की सेवा में अपनी जवानी तक कुर्बान कर दी।

19. बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अपनी भूमिका निभाने वाले बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर 1910 को पश्चिम बंगाल के नानी बैद्वान जिले के औरी गांव में हुआ था।

8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त सबकी नजरों में आए जब उन्हें भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट के लिए गिरफ्तार किया गया। बटुकेश्वर दत्त चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के संपर्क में आए और उनसे प्रभावित होकर क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन को ज्वाइन कर लिया। इन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी भाग लिया।

बम विस्फोट के कुछ दिनों बाद ही भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के साथ साथ बटुकेश्वर दत्त को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा दी गई जबकि भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को एक ही दिन फांसी के फंदे पर चढ़ाने का निर्णय किया गया। बटुकेश्वर दत्त खुद को बहुत अपमानित महसूस कर रहे थे वह चाहते थे कि उन्हें भी भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए।

जब भगत सिंह को यह बात पता चली तो उन्होंने एक पत्र के माध्यम से बटुकेश्वर दत्त को संदेश देते हुए कहा कि अंग्रेजी हुकूमत को यह भी दिखा दो कि भारतीय क्रांतिकारी केवल मातृभूमि के लिए अपनी जान ही नहीं दे सकते बल्कि जीवन भर कैद में रहकर प्रताड़ना अत्याचार और क्रूरता भी सह सकते हैं।

कहा जाता है कि साल 1945 में काला पानी की सजा काटकर बटुकेश्वर दत्त जेल से छूट गए जिसके बाद उन्होंने साल 1947 में विवाह कर लिया। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इन्हें किसी भी प्रकार का सम्मान नहीं दिया गया और इन्होंने अपना जीवन काफी कठिनाइयों से गुजारा। लेखक अनिल वर्मा ने अपनी पुस्तक में बताया है कि आजादी के बाद इन्होंने अपने जीवन के दिन सिगरेट कंपनी एजेंट और टूरिस्ट गाइड के तौर पर गुजारने पड़े जबकि उनकी पत्नी आजीविका चलाने के लिए पढ़ाया करती थी।

जेल से रिहा होने के बाद बटुकेश्वर दत्त को ट्यूबरकुलोसिस हो गया था। क्षय रोग से पीड़ित होने के कारण 20 जुलाई 1965 को दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में इनकी मृत्यु हो गई।

20. विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar)

विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा नाम है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से कभी भी पृथक नहीं किया जा सकता।

भले ही सावरकर राजनीतिक दृष्टि से विवादास्पद हों लेकिन उनके भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। विनायक दामोदर सावरकर एक दृढ़निश्चयी और प्रखर राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे जिनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक के भगूर में हुआ था।

विनायक सावरकर भारत के महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक, विचारक, और लेखक भी थे। 1857 में भारत में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर गहन अध्ययन और विचार करने के बाद विनायक सावरकर जी ने एक पुस्तक की रचना की जिसका नाम “द इंडियन वर आफ इंडिपेंडेंस 1857 ” था। इस पुस्तक के प्रकाशन से ही अंग्रेजी हुकूमत में खलबली मच गई और अंग्रेजों ने इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया।

इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 के खिलाफ विरोध में विनायक सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर को दोषी करार देते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी कर दिया लेकिन विनायक सावरकर बच बचाकर पेरिस चले गए। लेकिन साल 1910 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 50 साल की सजा सुनाई गई।

आज के इस लेख में हमने स्वतंत्रता सेनानियों (Freedom Fighters of India in hindi) के बारे में जाना की उन्होंने कैसे अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी दिलाई। हमे हमेशा स्वतंत्रता सेनानियों पर गर्व रहेगा। हम उम्मीद करते हैं आपको हमारा ये लेख पसंद आया होगा। पसंद आया हो तो इसे अपने मित्रो व सगे संबंधियों के साथ अवश्य शेयर करें।

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