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Pongal 2023: पोंगल पर निबंध, आइये जाने कब और क्यों मनाया जाता है पोंगल का त्यौहार? | History & Essay on Pongal in Hindi

पोंगल का त्यौहार 2023 कब और क्यों मनाया जाता है? पोंगल पर निबंध, महत्व, अर्थ, पोंगल त्योहार का पौराणिक इतिहास और कथा (All Information about Pongal 2023 Festival, story, facts, History, Significance, Importance, Pongal Festival Dates in 2023)

पोंगल तमिलनाडु का प्रमुख त्योहार माना जाता है जिसे मकर संक्रांति के तर्ज पर मनाया जाता है। एक ओर जहां उत्तर भारत के लोग 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्यौहार मनाते हैं तो वहीं दक्षिण भारत में तमिलनाडु के लोग इस त्यौहार को पोंगल के रूप में मनाते हैं।

पोंगल का त्योहार लगभग 4 दिनों तक चलता है जिसे तमिलनाडु के हिंदुओं द्वारा अलग-अलग हिस्सों में बांटकर मनाया जाता है जिनकी जानकारियां आज हम आपको इस आर्टिकल में देने वाले हैं।

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कब और क्यों मनाया जाता है पोंगल का त्योहार?

पोंगल पर निबंध (Essay on Pongal in Hindi)

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के नाम से मनाया जाता है। इस त्यौहार को मकर संक्रांति के तर्ज पर 14 जनवरी को ही मनाया जाता है। हालांकि पोंगल के त्योहार को मनाने का सिलसिला चार दिनों तक चलता है जिसे चार अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में इस त्यौहार की शुरुआत 14 जनवरी को होती है और 18 जनवरी को यह त्योहार समाप्त हो जाता है।

पोंगल का त्योहार मुख्य रूप से कृषि से जुडा हुआ है क्योंकि इस त्यौहार के मौके पर तमिलनाडु और दक्षिण भारत के लोग अपने आगामी फसल की भरपूर पैदावार के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।

पोंगल के त्यौहार का अर्थ एवं पौराणिक महत्व–

पोंगल का त्योहार मुख्य रूप से 14 जनवरी के दिन मकर संक्रांति के तर्ज पर मनाया जाता है। हालांकि इस दिन पोंगल की शुरुआत होती है और यह अगले 4 दिनों तक मनाया जाता है।

पोंगल शब्द का अर्थ उफनना या उबालना है। इस दिन गुड़-चावल को उबालकर काजू, किशमिश की खीर बनाई जाती है और सूर्य देव को प्रसाद के रुप में अर्पित की जाती है।

मकर संक्रांति यानि कि 14 जनवरी के दिन भगवान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं जैसे हिंदुओं की मान्यताओं में अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन हिंदू धर्म में स्नान दान और खिचड़ी का भोजन करने की अवधारणा प्रचलित है।

मकर संक्रांति के त्योहार को ही भारत के अलग-अलग राज्यों और हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जिनमें गुजरात और राजस्थान का उत्तरायण तथा तमिलनाडु का पोंगल भी एक है।

पोंगल त्योहार का पौराणिक इतिहास और कथा–

पोंगल त्योहार का पौराणिक इतिहास बेहद पुराना है। संस्कृत पुराणों में पोंगल के त्यौहार का उल्लेख द्रविड़ फसल त्यौहार के रूप में किया गया है। हालांकि इस त्योहार के साथ कई सारी पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई है जिनमें से एक पौराणिक कथा बेहद प्रचलित है।

इस पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपने बैल बसव को पृथ्वी पर मनुष्यों के लिए संदेश ले जाने के लिए कहा। भगवान शिव ने पृथ्वी के मनुष्यों को हर दिन तेल से स्नान और महीने में एक बार भोजन करने का संदेश दिया था। लेकिन भगवान शिव के बैल बसव ने पृथ्वी पर जाकर मनुष्यों से उल्टी सीधी बात कह दी। बैल बसव ने भगवान शिव की बात को उलट पलट पर मनुष्यों से कह दिया कि उन्हें एक दिन तेल से स्नान करना चाहिए जबकि रोजाना भोजन करना चाहिए।

जब भगवान शिव को इस बात का पता चला तो वह अत्यधिक क्रोधित हो गए और क्रोध में आकर उन्होंने बैल बसव को पृथ्वी पर चले जाने का श्राप दे दिया। भगवान शिव ने बैल बसव को स्थायी रूप से पृथ्वी पर भेज दिया और कहा कि अब तुम्हें मनुष्यों के रोजाना भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए फसल उगाने में उनकी मदद करनी होगी और हल जोतना होगा। इसीलिए पोंगल का यह खास दिन मवेशियों से भी विशेष संबंध रखता है और इसे कृषि त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

पोंगल के त्यौहार को लेकर एक दूसरी पौराणिक कथा भी बेहद प्रचलित है जो भगवान श्री कृष्ण और देवराज इंद्र से संबंधित है। पौराणिक कथा के अनुसार माना जाता है कि जब भगवान इंद्र को देवताओं का राजा बनाया गया तो राजगद्दी पर बैठने के बाद उनके भीतर इसे लेकर अभिमान आ गया।

बचपन के दौरान जब भगवान श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र के इस अहंकार को देखा तो उन्होंने इंद्र को सबक सिखाने के लिए एक तरकीब निकाली और समस्त गोकुल वासियों को भगवान इंद्र की पूजा और उनके लिए यज्ञ करने से मना कर दिया और कहा कि गोकुल वासियों को गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए और अपनी फसलों का श्रेय इसे ही देना चाहिए क्योंकि इस पर ही फसलों का बीज अंकुरित होता है।

जब देवराज इंद्र को इस बात के बारे में भनक लगी तो उन्हें गोकुल वासियों के ऊपर काफी गुस्सा आ गया। गोकुलवासियों को अपने सम्मान की अवहेलना करने के कारण दंड देने के लिए देवराज इंद्र ने तेज तूफान और भयानक बारिश से गोकुल वासियों को डराना शुरू कर दिया। 3 दिनों तक मूसलाधार बारिश के कारण गोकुल में चारों ओर हाहाकार मच गया इस बीच भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी उंगली पर उठा लिया।

और गोकुल वासियों को बताया कि एक बार फिर से गोवर्धन पर्वत ने उनकी सहायता की है जिस पर देवराज इंद्र का अभिमान टूट गया और वह भगवान श्री कृष्ण से क्षमा मांगने लगे। देवराज इंद्र की क्षमा याचना के बाद भगवान श्री कृष्ण अपने ग्वाल बालों और अपनी गायों के साथ फसल उगाने में लग गए। इस तरह पोंगल पर कई सारी ऐसी कथाएं जुड़ी हुई हैं जो इसे कृषि से संबंधित बताती हैं।

पोंगल 2023 कब मनाया जाएगा?

हर साल की तरह इस साल भी 15 जनवरी 2023 को पोंगल का त्यौहार मनाया जाएगा। त्योहार मनाने की अवधि 14 जनवरी से लेकर 18 जनवरी तक होगी यानी कि यह त्यौहार कुल 4 दिनों तक मनाया जाएगा। विशेषकर पोंगल का त्यौहार दक्षिण भारत के तमिलनाडु में मकर संक्रांति के तर्ज पर मनाते हैं।

चार दिनों तक मनाया जाता है पोंगल का त्यौहार–

हालांकि तमिलनाडु में मकर संक्रांति के तर्ज पर 14 व 15 जनवरी के दिन पोंगल का त्यौहार मनाया जाता है। लेकिन तमिलनाडु के लोग इस त्यौहार विशेष को 14 जनवरी से लेकर 18 जनवरी तक मनाते हैं। पोंगल के इन चारों दिनों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

दिवसदिनांकपोंगल
प्रथम 15 जनवरी 2023भोगी पोंगल
द्वितीय 16 जनवरी 2023थाई पोंगल
तृतीय 17 जनवरी 2023मट्टू पोंगल
चतुर्थ 18 जनवरी 2023कान्नुम पोंगल

पहला दिन: भोगी पोंगल–

14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर पोंगल त्योहार की शुरुआत होती है जिसके पहले दिन को भोगी पोंगल के नाम से जाना जाता है। त्योहार का यह दिन देवताओं के राजा हिंदू को समर्पित है जो किसानों के जीवन में वर्षा ऋतु लाते हैं जिससे खेतों में उनकी हरी भरी फसलें लहलहाती हैं।

भगवान इंद्र के प्रति अपनी कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए तमिलनाडु के लोग पोंगल त्योहार के पहले दिन को भोगी पोंगल के रूप में मनाते हैं और भगवान इंद्र की पूजा अर्चना करते हैं।

इस दिन खास कर साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। घर के सभी सदस्य सुबह जल्दी उठकर पूरे घर की साफ सफाई करते हैं और एकत्रित कचड़े तथा कूड़ा करकट को गोबर और लकड़ी की आग में जलाते हैं। इतना ही नहीं इस दिन घर की टूटी फूटी और पुरानी चीजें भी जलाई जाती हैं।

त्यौहार के दिन जलते हुए अलाव के चारों ओर तमिलनाडु की महिलाएं और लोग नाचते गाते नजर आते हैं। हालांकि इस दिन का सर्दियों को लेकर भी विशेष महत्व है।

दूसरा दिन: थाई पोंगल –

पोंगल त्यौहार के दूसरे दिन को थाई पोंगल के नाम से जानते हैं। इस दिन तमिलनाडु के लोग खासकर भगवान सूर्य की पूजा अर्चना करते हैं और उन्हें उबलते हुए चावल दूध का भोग लगाते हैं। भगवान सूर्य को जिस बर्तन में भोग लगाया जाता है उस बर्तन में हल्दी की एक गांठ बांधी जाती है क्योंकि ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है।

इतना ही नहीं थाई पोंगल के दिन चूना पाउडर का घोल और लेप बनाकर घरों की पुताई की जाती है तथा हाथों से तमिलनाडु की परंपरागत डिजाइन में रंगोलियां बनाई जाती हैं। त्यौहार के इस दिन खासकर दूध और चावल का भोजन करना शुभ फलदाई माना जाता है।

तीसरा दिन: मट्टू पोंगल –

पोंगल त्योहार के तीसरे दिन को मट्टू पोंगल के नाम से जाना जाता है। त्यौहार का यह दिन खासकर गायों और बैलों को समर्पित होता है। इस दिन खासकर गाय बैलों के गले में नई घंटियां बात कर उन्हें सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। खेती में बैलों को किसानों का साथी माना जाता है और कहा जाता है कि भगवान शिव के श्राप के कारण आज वह हल चलाते हैं और उनके खेतों की जुताई करते हैं।

इसीलिए गाय और बैलों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए त्योहार का यह तीसरा दिन मनाया जाता है। तमिलनाडु के कई इलाकों में इस मौके पर जलीकट्टू प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें बैलों के नियंत्रण का मुकाबला कराया जाता है।

चौथा दिन: कान्नुम पोंगल

पोंगल त्योहार का चौथा और आख़िरी दिन कान्नुम पोंगल के नाम से मनाया जाता है। इसे कानू पोंगल के नाम से भी बुलाया जाता है। इस दिन गन्ने की फसल पककर तैयार हो जाती है कन्नुम पोंगल के आखिरी दिन गृहणियां बचे हुये पकवान पोंगल को केले पत्ते पर परोसती है जिसे पक्षियों के खाने लिये रखा जाता है। इस दिन दोस्तों व रिश्तेदारों के मिलने जाते है उपहार व शुभकमानाएं देते है मिठाईयां बांटते है।

FAQ

पोंगल का त्योहार कब मनाया जाता है?

15 जनवरी।

पोंगल का अर्थ क्या है?

पोंगल का तमिल में शाब्दिक अर्थ विप्लव, उफनना या उबालना है।

पोंगल का त्योहार कहां मनाया जाता है?

तमिलनाडु, दक्षिण भारत।

पोंगल के त्यौहार पर किसकी पूजा की जाती है?

भगवान सूर्य की।

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